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Monday, 23 October 2017

16 दिसम्बर विजय से पराजय दिवस तक

शर्दियों के दिन थे और पाकिस्तान ने हमारे 11 हवाई अड्डों पर हमला कर दिया था जिससे मज़बूरी में हमें एक ऐसी जंग में कूदना पड़ा जो एक अजीब से भौगोलिक लगने वाले देश के अंतर्विरोधों से पैदा हुई थी जिसका एक हिस्सा भारत के उत्तर पश्चिम में और दूसरा भारत के पूर्वी छोर पर हुआ करता था ये वास्तव में अजीब लगने वाला भौगोलिक बंटवारा था जो 1947 में हुआ था|
यह एक ऐसी जंग थी जिसमे हमारे जवानों ने दो छोरों पर विदेशी मदद से लड़ने वाले देश को झुकने पर मजबूर कर दिया| भारत की फ़ौज और मुक्ति वाहिनी ने शौर्य और पराक्रम की ऐसी गाथा लिखी के दुश्मन को मैदान तो छोड़ना ही पड़ा बल्कि उसको अपने पूर्वी हिस्से से भी हाथ धोना पड़ा जो आज बांग्लादेश है| जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में 16 दिसम्बर 1971 को भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान की फ़ौज के जनरल आमिर अब्दुलाह निआजी को अपने 93000 हथियारबंद सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया|
इसको हम "विजय दिवस" के रूप में मनाते हैं अपने सैनिकों के अथक प्रयासों और बहादुरी और युद्ध के परिणाम अवश्य ही यह नाम सर्वथा उचित है|
इसके ठीक 41 साल बाद 16 दिसम्बर 2012 को देश की राजधानी में एक ऐसा हादसा हुआ जो नया तो नहीं था परन्तु इसकी गूँज ऐसी थी कि देशभर के लोगों की रूह काँप उठी| शायद ये मानवता की या फिर यूँ कहूँ पुरुषवादी सोच की सबसे वीभत्स ज्ञात घटनाओं में से एक थी| एक तरफ तो एक बेटी जिंदगी और मौत से लड़ रही थी वंही दूसरी और दिल्ली में इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक देश भर से आये युवक और युवतियों ने इस देश के आकाओं से नींद से जागने का आह्वान किया| यह लड़ाई किसी देश के आजाद कराने या विरोध की नहीं थी परन्तु ये थी अपने अधिकारों को सुनिश्चित करने की, कुछ लोगों को अपने कर्तव्य याद दिलाने की और न्याय के लिए गुहार नहीं आदेश सुनाने की| इन युवाओं के संघर्ष ने कानून बनवाकर एक नया इतिहास लिखा परन्तु इस कहानी का दुखद अंत हुआ 41 साल पहले हम जीते थे परन्तु इस बार हम हार गए और ये हार मानवता की हार थी एक तरफ तो उस हम आजादी के 60 सालों में भी ऐसे चिकित्सालय नहीं बना पाए जहाँ हम उस बहादुर लड़की का इलाज करवा पाते वहीँ दूसरी और हमारे नेताओं के एक से एक अजीब बयानों ने पीड़ा को और बढ़ा दिया| किसी ने बोला कुछ लोग फैशन करके इंडिया गेट पर बैठे हैं, कुछ ने छात्रों पर एक पुलिस वाले की मौत का इल्जाम लगाने तक का षड्यंत्र तक रच दिया|
अजीब सी बेचैनी थी कुछ दिनों बाद खबर आई सिंगापूर में उस बहादुर बेटी ने अपने प्राण गँवा दिए हम पराजित हो गए मानवता के मानकों पर ये हमारी सबसे बड़ी पराजय थी| पर क्या हमने उससे कुछ सिखा?, क्या ऐसे मामले कम हुए क्या? लोग सुधरे? ये सवाल हैं और इनके जवाब उस पराजय को रोज जीने का अहसास कराते हैं|
बड़ा असमंजस है इसको विजय दिवस कहूँ या पराजय दिवस

संदूक साहित्य भाग एक

महबूब को छोड़ अब मैंने संदूक पर लिखा है, नहीं नहीं ये वो भैंस पर लिखे मुर्ख छात्र के निबंध जैसा नहीं
संदूक जो हिस्सा है मेरे आपके जीवन के उतार चढ़ाव का
संदूक जिसमे यादें पिछले बरस की, संदूक जिसमे कपडे अगले बरस के
संदूक जिसमे किताबें पिछले बरस की, संदूक जिसमे बर्तन अगले बरस के
संदूक जिसमे रजाई सर्दियों की, संदूक जिसमे खेस गर्मियों का
संदूक भूत है संदूक भविष्य है अरे साहब संदूक ही वर्तमान है
सोचो संदूक न होता तो कहाँ रखते वो पोटलियाँ लिखी हुई खतों की
कहाँ संजोते पुराने फोटो, वो डायरी गुलाब के फूलों की
संदूक ही जिंदगी का मजमून, संदूक बिना सब सून
चलिए शादी में चलते हैं, अरे संदूक से सूंट तो निकाल लाओ
वो दादा जी वाली टाई भी ले आना अच्छी लगती है
मेरे एक दोस्त ने कहा संदूक न हुआ जिमखाना हो गया
अरे आप क्या जाने दीवान में सामान रखके उसके ऊपर सोने वाले
जनाब हम पलंग वाले संदूक में सामान रखा करते थे
हर बरस सर्दियों के आने से पहले और बारिस के जाने के बाद खोला जाता था पूरा संदूक
धुप के हवाले कर दिया जाता था पूरा सामान और बेचारे संदूक को हवा का अहसास तभी होता था
मेरा सच्चा दोस्त था संदूक, उसमे किताबें जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी छिपा दिया करता था
वो भी चुपचाप किसी कोने में ऐसे दबा लेता था जैसे निकलने ही नहीं देगा
संदूक वो कथा है जो पूरी नहीं हो सकती, तो ले लेते हैं संदूक से एक अल्पविराम

छुट्टियों के दिन और मामा का घर

एक समय था जब परीक्षा के परिणाम से ज्यादा उसके बाद होने वाली छुट्टियों का इंतजार किया करते थे| तक़रीबन हर साल एक यही तो समय होता था जब गर्मियों की छुट्टियां पड़ती थी और मामा के घर 10-15 दिन के लिए जाना होता था| हमारी साल की पिकनिक, भ्रमण वही होता था| मामा का घर मतलब सपनों का आशियाना जहाँ कोई पाबन्दी नहीं खुला आसमान, पेड़, खेत, बाग़ और नहर से निकला हुआ नाला जो हमारा फन पार्क, थीम पार्क, वाटर पार्क और न जाने क्या क्या सब कुछ वही था| गाँव में खेतों के नाम होते हैं, देता वाला खेत, पुलिया वाला खेत, सुबह शुरू होती थी दो रोटी एक गंठा (प्याज) और मेरा सबसे पसंदीदा ननि घी यानि मक्खन (जिसको शहर वाइट बटर कहता है) और मट्ठा यानि छाछ (जिसको शहर आजकल लस्सी भी कहने लगा है) नाश्ता इससे बहतरीन कुछ नहीं| फिर निकल पड़ते नानी, मौसी और मामा के बच्चों के साथ पुलिया वाले खेत में जहाँ उड़द की दाल चुंटी (तोड़ी) जाती, उसको हम बाल्टियों में इकठ्ठा करते, शर्त लगती थी कौन पहले बाल्टी भरेगा| 2-3 घंटे यहाँ बिताने के बाद भैंस, झोटे (भैंसा) और बैलों को लेकर हमारे फन पार्क वाले नाले में जाते थे, जानवरों को नहलाने और मस्ती करने, यमराज की तरह भैंसे की सवारी हम भी करते, नाना को पता होता कि हम भैंसे की सवारी करेंगे तो वो ज्यादातर हमारे आसपास ही रहते, वैसे हमारे घर भी भैंसा और दूसरे जानवर थे पर वहां छूट नहीं होती थी, ऊपर से मम्मी का डर| ये डर दोतरफा था और आज भी है हमें मम्मी की डांट और पिटाई का डर और मम्मी को इनको कुछ हो न जाये वाला डर, ये तो अब शाश्वत है इसका कुछ किया नहीं जा सकता| पर मामा के यहाँ ये बेड़ियाँ और बंदिशें नहीं होती थीं क्योंकि मम्मी को भी तो नाना और नानी का डर होता है अब जो शाश्वत है वो सबके लिए है|
तो हम कहाँ थे हाँ नाले पर, वो नाला इतना गहरा था के हम पैर नीचे रखकर तैरने का नाटक कर सकते थे और तैरना वो आजतक नहीं सिखा उसमे 2 घंटे कभी जानवरों को नहलाते और कभी खुद मस्ती करते, उस समय हमारे लिए सबसे बड़े आश्चर्य की चीज़ हुआ करती थी उसमे बनने वाले भंवर जिसके इर्द गिर्द हमने सैकड़ों कहानिया बुन ली थी कुछ रोचक और कुछ बकवास, सबसे साधारण परन्तु प्रचलित कहानी थी यहाँ भूत है और वो पानी भर के कहीं ले जा रहे हैं, कुछ बड़े होने के बाद पता चला नाले में नीचे से दूसरे छोटे नाले में पानी जाता था इस वजह से भंवर बनते थे| 
आगे फिर कभी

मैं "सिंघम रिटर्न्स" देख रहा हूँ, समय रिटर्न्स विथ टर्नस

कुछ साल पहले एक फिल्म आयी थी सिंघम रिटर्न्स इसमें अरिजीत सिंह का गया हुआ एक गीत था "सुन ले जरा" इसमें फिल्म का हीरो बाजीराव एक दरगाह पर दुआ मांगता हुआ दिखाया गया है, इसमें वो दरगाह नतमस्तक भी होता है जिसको शीश झुकाना भी कहा सकते हैं
इन्टरनेट से लिया है अगस्त 2014 का है जब फिल्म आई थी[/caption]तब एक तरफ अजय देवगन थे और तथाकथित हिंदूवादी संघठन एक तरफ, धमकियों का दौर था देशव्यापी विरोध, जो सनेमा दिखायेगा तोड़ देंगे, अजय देवगन का बहिष्कार करेंगे, सिंघम रिटर्न्स का बहिष्कार करेंगे, जो नहीं मानेगा वो हिन्दू धर्म का दुश्मन, इनकी दुकान बंद कराएँगे
फिल्म के शीर्षक के हिसाब से हीरो लौट कर आता है और मेरे लेख के हिसाब से समय लौट कर आया है किरदार वही हैं कुछ कुछ कुछ नए किरदारों और पटकथा के साथ
पिछले कुछ दिनों से देख पढ़ रहा हूँ की "ऐ दिल है मुश्किल" का विरोध हो रहा है कहा जा रहा है इसमें पाकिस्तानी कलाकार ने काम किया है इसलिए हमें इसका बहिष्कार करना चाहिए यहाँ तक की मुख्यमंत्री की मौजूदगी में महाराष्ट्र के अनौपचारिक बहिष्कार मंत्री (घड़ी घड़ी उत्तर भारतियों पर लाठी डंडे चलाने वाले) ने पांच करोड़ रूपये कहीं जमा कराने के लिए धमकी देकर मांग लिए|
 
इसका सिंघम रिटर्न्स से क्या लेना देना ये आपने मन में आएगा पर ऐ दिल है मुश्किल के साथ एक और फिल्म आई मेरे आराध्य भगवान् राम के आराध्य भगवान् शिव के नाम पर आधारित "शिवाय" जिसमे वही अजय देवगन हीरो की भूमिका में हैं जो सिंघम रिटर्न्स में थे, पर जैसे मैंने कहा समय रिटर्न्स विथ टर्नस, आज वही लोग जो अजय देवगन को बर्बाद करने की कसम खा रहे थे दुआ में लगे हैं कि "शिवाय" हिट हो जाये और "ऐ दिल है मुश्किल" पिट जाये|
 
ये दोनों बाजार का हिस्सा हैं और मुझे यकीन है दोनों फिल्मे अच्छा मुनाफा करेंगी, पर ये कौन हैं जो बहिष्कार करने आते हैं लाठी डंडे लेकर, धमकियाँ लेकर, सीन काट दो पैसे दे दो, पैसे वहां जमा करा दो ये करदो वो करदो तो विरोध नहीं करेंगे के प्रस्ताव लेकर|

विमुद्रीकरण-पुनर्मुद्रीकरण-कैशलेस-लेसकैश

प्रधानमंत्री जी की भाषा में विमुद्रीकरण या अरुण जेटली जी भाषा में कहूं तो पुनर्मुद्रीकरण को भारत की जनता ने पास कर दिया है अब ये आने वाला समय बताएगा की पुनर्मुद्रीकरण भारत की जनता को कितना पास करता है| अभी के हिसाब से सरकारी विभाग ये बताने को तैयार नहीं है कि कितना पैसा वापस आया, अपुष्ट ख़बरें ये आ रही है लगभग 97 प्रतिशत पैसा वापस आ चुका है, और अपुष्ट ख़बरें ये भी बता रहीं है कि केन्द्रीय बैंक अभी पुनर्गणना कर रहा है क्योंकि उनको दोहरी गणना का अंदेशा है|
10 दिसंबर को आखिरी बार केन्द्रीय बैंक ने 12.44 करोड़ वापस आने की बात अधिकारिक रूप से कही थी| 8 नवम्बर के प्रधानमंत्री जी के संबोधन के अगले दिन से 2 सप्ताह बाद तक ये चर्चा होती रही और सरकार भी यही कहती रही जो पैसा वापस नहीं आएगा वो इस कदम की सफलता का परिचायक होगा और वो पैसा सरकार लोगों के भले के लिए इस्तेमाल करेगी| दो हफ्ते के बाद दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और अचानक पहले कैशलेस और फिर लेसकैश की तरफ बहस मुड़ने लगी, मुझे भी लगता है कैशलेस या लेसकैश की ओर जाने से कुछ फायदा तो जरुर होगा, परन्तु क्या सिर्फ इसके लिए देश भर को कृत्रिम आपदा के जैसे हालात में झोंक देना सही था| सरकार का लक्ष्य निश्चय ही कुछ ओर रहा होगा जो अभी अज्ञात है और वो अभी बोलना नहीं चाह रहे| कैशलेस का तो कभी भी प्रचार करके, मुद्रा को थोडा रोककर, लोगों में जागरूकता फैलाकर और जैसी अभी स्कीम चलायी गयीं है (जिनको  कुछ लोग सब्सिडी की तरह भीख नहीं मानते [मैं तो सब्सिडी और इनाम दोनों को आवश्यक मानता हूँ]) किया जा सकता था.
जिस दिन विमुद्रीकरण की घोषणा हुई तो मैं और मेरे साथ कईं लोग बिना किसी संशय के ख़ुशी मना रहे थे, मैं प्रधानमन्त्री का आलोचक हूँ पर उसके अपने कारण हैं वो फिर कभी| पर मुझे अच्छा लगा जो चेतावनी प्रधानमंत्री जी ने 30 सितम्बर को ख़त्म होने वाली अघोषित धन से सम्बंधित योजना के लिए दी थी कि यह आखिरी मौका है उसको साकार किया और कहा अब बस जिसके पास है वो कूड़ा हो गया कम से कम कैश वाला तो हो ही गया, जिस राजनितिक दल का मैं समर्थक हूँ वो दो दिन बाद सरकार के फैसले के खिलाफ सड़कों पर था पर मेरा विश्वास नहीं डिगा मुझे लगा कुछ अच्छा होने वाला है और इसमें कुछ तकलीफें होंगी| मेरे दोस्तों ने, गाँव वालों ने अलग से बार बार मुझसे पूछा कि किधर हो, मैंने हर बार यही कहा मैं इस मुद्दे पर केजरीवाल से सहमत नहीं हूँ (वो मुझसे शायद बार बार इसलिए पूछते थे क्योंकि उनको विश्वास नहीं था, पर जो है वो है)| फिर एक दिन अचानक एक खबर आयी कि सरकार कालेधन वालों के लिए  एक और योजना लेकर आ रही है, नाम रखा गया प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (हमारे यहाँ गरीब, देश, सेना कुछ ऐसे शब्द हो गए हैं जिनके बाद सवाल जवाब बंद कर दिए जाते हैं) इस योजना के तहत कालेधन वाले अपनी अघोषित आय दिखाकर सरकार को 50 प्रतिशत देकर 25 प्रतिशत घर ले जा सकते हैं और 25 प्रतिशत 4 साल बाद ले जा सकते हैं, मुझे विश्वास नहीं हुआ सरकार ने कहा था 30 सितम्बर को कि यह आखिरी योजना है अब कार्यवाही होगी, लोग पकडे जायेंगे और सजा होगी, फिर सरकार को ये क्या हो गया था, मेरा विश्वास हिल गया मैंने बहुत बहस की, मुझे बताया गया ऐसा नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो, अगले दिन लोकसभा में बिल आया और लोकसभा में कोई काम हुआ या नहीं हुआ ये बिल पास हो गया सिर्फ एक दिन में एक बिल पास हो गया और वो था इनकम टैक्स अमेंडमेंट जो नयी योजना के लिए लाया गया था उसमे साफ़ साफ़ वोही लिखा था जैसा मैंने ऊपर प्रेषित किया| ये मेरे हिसाब से पहला विश्वासघात था उस जनता के साथ जो देश के लिए लाइन में लगा दी गयी थी, अगर लोगों को डराना इस मुहीम का लक्ष्य था तो 2-4 लोगों पर कार्यवाही करके डराकर तथाकथित गरीब कल्याण योजना लायी जा सकती थी|
दो लक्ष्यों पर हमने बात कर ली एक कैशलेस और दूसरा कालेधन वालों को डराना, इन दोनों के लिए पूरे देश को परेशान करने का कोई औचित्य मेरी समझ से परे है|
फिर एक दिन नया रहस्योद्घाटन किया गया कि राजनितिक दल कितना भी पैसा जमा करा सकते हैं और कोई जांच तक नहीं होगी, कोई आंच नहीं आएगी| प्रधानमंत्री जी ने एक सभा में बोला उनकी सरकार ने पहले से बने नियम में कोई नया बदलाव नहीं किया राजनितिक पार्टियों को पहले से छूट प्राप्त है, मेरा मानना है जब सब नियम रोज रोज बदले जा रहे थे तो क्या यह एक नहीं बदला जा सकता था|
बहुत से लोग बोल रहे हैं कि विमुद्रीकरण या पुनर्मुद्रिकरण के फायदे लम्बे समय में दिखाई देंगे, वो क्या फायदे होंगे या कितने लम्बे समय बाद दिखाई देंगे कोई बताना नहीं चाहता|
ऐसी तैसी डेमोक्रेसी से लिया एक प्रसंग
"पहले : अगर पूरा पैसा वापस नहीं आएगा तो वो जीत होगी
अब : क्योंकि पूरा पैसा वापस आ गया है तो जीत है"
शोले वाला सिक्का

मामा जी अगले दिन साईकिल ले आये थे

मैं दसवीं कक्षा में था, बोर्ड की परीक्षा का साल भारत में सबसे तनाव और उम्मीदों से भरा साल होता है| चार लोगों से इस साल में सबसे ज्यादा परिचय होता है, ठीक से पढ़ ले उसको देख वो कितना पढ़ रहा है अगर ठीक से नंबर नहीं आये तो चार लोग क्या कहेंगे| मैं खुशकिस्मत था मुझे कभी नंबर के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया, माता पिता दोनों अध्यापक हों और पढ़ने के लिए जोर न दिया जाए यह सुख विरले ही किसी को मिलता है|
सर्दियों के दिन थे रोजाना की तरह सुबह साढ़े चार बजे उठा, पांच बजे राजीव भाई जी के यहाँ पढ़ने के लिए जाना होता था| पास वाले गाँव में जाने के लिए रोज सुबह साढ़े चार बजे उठना दिनचर्या का हिस्सा था, सुबह उठकर कभी मम्मी चाय बना देती थी कभी खुद बना लेता था, कभी मन किया तो रात की रखी हुई एक रोटी मक्खन के साथ (शहर जिसको वाइट बटर कहता है) खाकर निकल जाता था| सामने होती थी अपनी हीरो साईकिल मेरी प्यारी साईकिल आजकल उसको स्टैण्डर्ड साईकिल कहने लगे हैं हमारे लिए तो वही थी क्योंकि गाँव में एकाध के पास ही दूसरे प्रकार की साईकिल थी| २२ इंच ऊँची मेरे पसंदीदा हरे रंग में हीरो साईकिल रोज मेरे साथ मिस्सरपुर से पंजनहेड़ी, पंजनहेड़ी से मिस्सरपुर, मिस्सरपुर से कनखल और फिर कनखल से मिस्सरपुर सफ़र किया करती थी या यूं कहूं हम एक दूसरे के साथ सफ़र करते थे, हम एक दूसरे के साथ इतना रम गए थे, कभी वो मेरी पैंट को अपनी चेन में लगे ग्रीस से गन्दा कर देती,कभी मैं उसको कीचड़ में गुजारकर| ये बात अलग थी कि पैंट मम्मी धोती थी और साईकिल को मैं|
राजीव भाई जी के यहाँ हम जाते तो थे गणित पढने पर क्रिकेट के बारे में सबसे गहन चर्चा वहीँ हुआ करती थी, और साथ ही उनका बीच बीच में कोई चुटीली पंक्ति बोल देना पढाई को रोमांचक बनाये रखता|
साईकिल और मेरा रिश्ता ऐसा हो गया था वो खुदबखुद सड़क में हुए गड्ढों से बचाते हुए आसानी से पंहुचा दिया करती थी, कितना कहाँ मुड़ना है अँधेरे में इतना अभ्यास हो गया था कि आँख मूंदकर भी पंहुचा जा सकता था, उस समय सड़क पर अधिकतर कोई वाहन भी नहीं हुआ करता था और ये स्ट्रीट लाइट क्या बला है वो हमने पहली बार शहर में देखी थी तो सड़क पर अँधेरा जबरदस्त रहा करता था|
रात में साईकिल अहाते में या फिर पड़ोस में खाली पड़े खुले हुए बरामदे में खड़ी होती थी, उसके बगल में एक चांदी के रंग की दूसरी साईकिल खड़ी होती थी, वो थोड़ी आधुनिक थी| गाँव में अकसर 7 बजे खाना खाकर बिस्तर में बैठ जाने की आदत है, गाँव में अभी भी कुछेक को छोड़कर लोग जल्दी ही खाना खाकर बिस्तर में बैठ जाते हैं| साढ़े सात बजे साईकिल में ताला लगाकर मैं सोने चला गया|

Wednesday, 11 October 2017

ट्रांसफॉर्मर और गाँव की कसमकस

यह उस समय की बात है जब मैं गाँव में रहता था ऐसा नहीं है कि अब नहीं रहता क्योंकि दिल से शहर कभी फबा ही नहीं पर अब आता जाता हूँ रह नहीं पाता। जब से पढ़ाई के लिए देहरादून गया तब से घर आना जाना ही होता है क्योंकि उसके बाद से नौकरी एनसीआर में चल रही है। मेरे लिए शहरी बनना बड़ा मुश्किल काम है, वो फिर कभी अभी पढ़िए ट्रांसफार्मर और गाँव की कसमकस!
साल 2004 से पहले की बातें है हमारे गाँव और आसपास के कई गाँव जहाँ जहाँ मैं जानता हूँ ट्रांसफॉर्मर का ख़राब हो जाना एक पूरा कार्यक्रम हुआ करता था।
वैसे मैंने इस कार्यक्रम में सीधे भाग नहीं लिया पर देखा बहुत बार है।
इसके कईं चरण होते थे
  1. कारण और घर घर चर्चा
  2. पैसे इकठे करना
  3. पुराना लेकर नया लाना
  4. ट्रांसफार्मर को लगाना
  5. गाँव में रौशनी के साथ हल्ला हो जाना
शुरुआत होती थी कि कैसे ख़राब हुआ आखिर हुआ क्या गाँव में हर घर में मुद्दा होता था आज घास(चारा) कैसे कटेगी, क्योंकि टीवी तो कम ही लोगों के पास होता था होता भी था तो लोग आदि नहीं थे। जब बिजली चली जाती पहले तो यह चर्चा होती कि गयी क्यों, क्योंकि बिजली कईं कारणों से जा सकती थी।
उस ज़माने में ट्रांसफार्मर से बिजली की सप्लाई बंद करने वाली हत्थी (स्विच) पर कोई ताला नहीं लगा होता था। जरुरत पड़ने पर लोग हत्थी से बिजली बंद करके वहां अपना एक आदमी खड़ा कर देते थे जब तक कि घर पर बिजली का फॉल्ट ठीक न हो जाये। कभी-कभी शरारती तत्व भी लोगों को परेशान करने के लिये इस हत्थी को नीचे खींच कर भाग जाते थे।
एक रोज रात को ऐसे ही किसी कारण से बिजली बंद थी। रात का दस बजे का समय रहा होगा। पड़ोस के एक ताऊ जी (गाँव में सब चाचा ताऊ होते हैं अंकल नाम का प्राणी नहीं होता) को लगा कि ट्रांसफार्मर पर देख कर आता हूँ, क्या कारण हैं। अँधेरी रात थी वह ट्रांसफार्मर की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक गोली चली और इसी के साथ दो पुलिस वालों ने उनको चोर समझकर पकड़ लिया। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गए थे। गाँव वालों के बताने पर पुलिस को भी समझ में आ गया था। उस समय अखबार में खबर आयी थी और उसका शीर्षक था…”किस्मत अच्छी थी जो बच गए”
अगर ट्रांसफार्मर ख़राब हो जाता तो फिर शुरू होता था पैसे इकठे करने का कार्यक्रम, गाँव के कुछ लोग मिलकर आपस में तय करते थे किससे कितने पैसे लेने हैं और हिसाब लगाया जाता कि किसके यहाँ घास काटने की मशीन चलती है, किसके यहाँ हीटर, कुछ लोग ऐसे होते थे जो कभी पैसे नहीं देते थे तो उनके पास सिर्फ समय ख़राब करने और उनके यहाँ से निकलने के बाद ये बात करने में जाया किया जाता था कि हमें तो पहले ही पता था यहाँ से नहीं मिलने वाले अबकी बार इनके यहाँ सिंगल फेज बिजली देंगे (पर ऐसा कभी होता नहीं था)| पैसे इकठे करने की कुछ वजहें थी, गाँव में लोगों को खुद ही रूड़की तक पुराना ट्रांसफार्मर गाँव से ले जाना और नया गाँव में लाना होता था उसके लिए वाहन तो गाँव के ही किसी व्यक्ति का ले लिया जाता परन्तु आने जाने के तेल, रूड़की में इंजिनियर को रिश्वत देने और जो लोग गए हैं उनके रास्ते में कुछ खाने के प्रबंध के लिए पैसों की आवश्यकता होती थी| इसमें बहुत मेहनत होती फिर भी कुछ लोग नाम रख ही दिया करते थे ये लोग कभी हिसाब नहीं देते सारे पैसे खा पीकर उड़ा देते हैं वगरह वगरह…कोई नहीं यह तो घर घर की कहानी…गाँव गाँव की कहानी है…
अब शुरू होता रोमांचक काम ट्रांसफार्मर को दो खम्बों के बीच बने प्लेटफोर्म से उतारना, मानों पूरा गाँव इकठा हो जाया करता और गांव के ही कुछ लड़के बनाये गए नियत स्थान यानी दो खम्बो के बीच बने प्लेफॉर्म से उतारते थे उस समय भीड़ लगी होती थी हम जैसे बच्चों की और गांव वालों की भी 10 लोग काम कर रहे होते तो 50 उन्हें ऐसा या वैसा करने को चिल्ला चिल्ला कर बोल रहे होते थे। एक यंत्र आया करता है उसको चेनकुप्पी बोला जाता है उसको आप हाथों से चलने वाली क्रेन भी बोल सकते हैं भारी से भारी सामान नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे पंहुचाने में मदद मिलती है।
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गूगल से लिया गया चेनकुप्पी चित्र
भौतिकी के सिद्धान्त पर बनी बहुत ही अच्छी हाथों से चलने वाली मशीन है एक आदमी चेन खिंचता रहता है और सामान धीमी धीमी गति से ऊपर या नीचे की और जाता है कुछ कुछ कुँए से पानी खीचने जैसा है पर यह उस समय की और भी आधुनिक मशीन है जिसमे भारी से भारी चीज़ को खीचने में ताकत नहीं लगानी पड़ती मेरे जैसा सामान्य कद काठी का आदमी भी यह काम कर सकता है।
सबसे पहले चेनकुप्पी को ऊपर वाले एंगल में लगाया जाता था फिर चेन के सिरे ट्रांसफॉर्मर में जोड़े जाते थे जिनमें हुक लगे होते, ट्रांसफॉर्मर के निचले हिस्से में रस्सियां बांधकर भीड़ के हवाले कर दी जाती जो ट्रांसफॉर्मर को यथास्थिति में बनाये रखने के लिए होती थी। ये रस्सियां तीन काम करती थीं एक ट्रांसफॉर्मर को खम्बों से टकराने से रोकती, दो उसको पेंडुलम की तरह झूलने से बचाती और तीन सभी दर्शकों के लिए मनोरंजन और चिल्लाने का मौका देती इधर मत करो उधर मत करो (वैसे गाँव की भाषा में इंघे नी ऊँघे नी) फिर 2 आदमी बारी बारी से चेनकुप्पी में चेन खींचते थे, जब एक थक जाता तो दूसरा खींचना शुरू कर देता, कईं बार यही क्रम दोहराए जाने के बाद ट्रांसफार्मर नीचे खड़े वाहन में पंहुचा दिया जाता| इतना होते ही भीड़ छटनी शुरू हो जाती क्योंकि अब नंबर आता था रूड़की जाने का क्योंकि वहां तो सब जा नहीं सकते थे और कुछ तो वाकई में जाना नहीं चाहते थे हम जैसों को जाने नहीं दिया जाता था|
ट्रांसफार्मर लाते हुए भी किस्से हो जाया करते थे, बहुप्रचलित किस्सा है गाँव के भोलेपन और अनजान होने का, उस समय मोबाइल तो था नहीं किसी के पास तो वापस आने की सूचना अकसर रूड़की से नया ट्रांसफार्मर लेकर लौटते हुए रस्ते में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सामने गाँव से लगभग 4 किलोमीटर दूरी पर बिजली घर पर लगे पीएनटी फ़ोन से दी जाती थी, एक बार एक बन्दे ने फ़ोन उठाकर बोला कि हम पंहुचने वाले हैं लाइनमैन को बुला लो, जब वो बाहर आये तो सबने पूछा किसको बोला, किसके नंबर पर मिलाया तो उसने बोला नंबर भी लगाना होता है क्या मैंने तो बस बोल दिया, जिनको मालूम था उन सबने खूब ठहाके लगाये, और मुझे बताया गया कि वो अब भी उस बात को याद करके हँसते पड़ते हैं|
गाँव में बच्चों का नेटवर्क बहुत ही कामयाब होता है जितनी तेजी से बिजली आती जाती थी उसी तेजी से खबर पंहुचने का काम बच्चे किया करते है, जैसे ही ट्रांसफार्मर आता जो भी बच्चा पास में होता उसको गाँव में खबर देने के लिए कहा जाता वो एक मोहल्ले में बोलता फिर वहां से दूसरा बच्चा दूसरे मोहल्ले में और अगला फिर उससे आगे ऐसे करके उस समय के सबसे कारगर नेटवर्क से खबर पूरे गाँव में फ़ैल जाती अब फिर वही मेला लग जाता जो ट्रांसफार्मर के उतरने के समय लगा था|
अब ट्रांसफार्मर को जैसे उतरा गया था उसी चेनकुप्पी के सहारे प्लेटफार्म तक चढ़ाया जाता, फिर से चेनकुप्पी को एंगल में लटकाया जाता और उसमें लगी संकल के सिरे को ट्रांसफार्मर के उपरी हिस्से से बांधकर पहले से विपरीत दिशा की संकल को खींचा जाता और वैसे ही रस्सियों को ट्रांसफार्मर को सुरक्षित रखने के लिए कईं लोग संभाले रखते थे, कभी कभी उस रस्सी को पकड़ने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता तो कईं कईं बार दोस्तों के बीच उसका जिक्र किया करता मैंने आज रस्सी को पकड़ा था या जब उनको मौका मिलता वो भी ऐसा ही करते भले ही हममे से किसी ने जरा भी ताकत न लगाई हो उस रस्सी से बंधे ट्रांसफार्मर को रोकने के लिए और सही में ताकत लगाने लायक स्थिति में हम होते भी नहीं थे| खैर कुछ लोगों की कड़ी मेहनत के बाद ट्रांसफार्मर अपने नियत स्थान पर स्थापित कर दिया जाता|
अब काम शुरू होता था 11000 की लाइन से ट्रांसफार्मर को जोड़ने का जो बेहद ही जोखिम भरा होता था एक तो ऊँचाई पर चढ़कर तारों को जोड़ना और ऊपर से बिजली आ जाने का अंदेशा होना, वैसे तो अधिकतर समय बिजलीघर पर गाँव से कोई गया होता था परन्तु कभी कभी दूसरे गाँव के लोग बिजलीघर में आकर बिजली चालू करने के लिए हंगामा करने लगते थे तो गलती होने की सम्भावना हमेशा बनी रहती थी| फिर भी गाँव के कुछ लोग जो अधिकतर बिजली का काम देखकर सीखे होते थे उनको तकनीकि शब्दावली का भले ही ज्ञान न हो परन्तु बिजली की रग रग से वो वाकिफ़ थे, कौन से तार कहाँ लगने है कैसे अर्थिंग देनी है सब कुछ देख देखकर वो सीख जाते थे और कर भी देते थे|
इस सब मेहनत के बाद बिजलीघर में खड़े आदमी तक सन्देश पंहुचाया जाता कि अब बिजली चालू करवा सकते हो। तब बिजली शुरू की जाती और ट्रांसफार्मर पर लगी हत्थी को ऊपर उठाया जाता, हालांकि अधिकतर बार सबकुछ सही हो जाया करता फिर भी कभी कभी डबल फेज की समस्या आ जाती क्योंकि देखकर सीखना और उसमे कोई एक कमी रह जाना लाजमी है, डबल फेज ऐसी समस्या है जिसमे 100 वाट का बल्ब 200 वाट की चमक तो देता है पर कुछ देर में फट भी जाता है, होता ये था कि जिस मोहल्ले में डबल फेज हो जाता वो चिल्ला रहा होता था बंद कर दो बंद कर दो और उस सूचना को भी बच्चे बखूबी अपने नेटवर्क से ट्रांसफार्मर पर खड़ी भीड़ तक पंहुचा देते|
जैसे ही गाँव में बिजली आती बच्चे पूरे गाँव में शोर मचाते हुए भागते थे उस क्षण का अपना ही आनंद होता था। जैसे ही बिजली आती जिनके यहाँ बिजली से चलने वाली चारा काटने वाली मशीन खच खच करने लगता। एक या दो वीसीआर वाले लोग थे तो उनके यहाँ जमावड़ा लग जाता फिल्म चालू हो जाती। कोई बिजली के माध्यम से जुड़ा था या नहीं फिर भी वो ख़ुशी मना रहा होता और ये उत्सव 3-4 दिन चलता, सब एक दूसरे से बात करते रहते। जिन्होंने काम किया होता वो तारीफ से फूले नहीं समां रहे होते।
ट्रांसफार्मर ही सर्वानंद था उस समय का…भगवान् कसम मजा ही आ जाता था।