Monday, 23 October 2017

16 दिसम्बर विजय से पराजय दिवस तक

शर्दियों के दिन थे और पाकिस्तान ने हमारे 11 हवाई अड्डों पर हमला कर दिया था जिससे मज़बूरी में हमें एक ऐसी जंग में कूदना पड़ा जो एक अजीब से भौगोलिक लगने वाले देश के अंतर्विरोधों से पैदा हुई थी जिसका एक हिस्सा भारत के उत्तर पश्चिम में और दूसरा भारत के पूर्वी छोर पर हुआ करता था ये वास्तव में अजीब लगने वाला भौगोलिक बंटवारा था जो 1947 में हुआ था|
यह एक ऐसी जंग थी जिसमे हमारे जवानों ने दो छोरों पर विदेशी मदद से लड़ने वाले देश को झुकने पर मजबूर कर दिया| भारत की फ़ौज और मुक्ति वाहिनी ने शौर्य और पराक्रम की ऐसी गाथा लिखी के दुश्मन को मैदान तो छोड़ना ही पड़ा बल्कि उसको अपने पूर्वी हिस्से से भी हाथ धोना पड़ा जो आज बांग्लादेश है| जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में 16 दिसम्बर 1971 को भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान की फ़ौज के जनरल आमिर अब्दुलाह निआजी को अपने 93000 हथियारबंद सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया|
इसको हम "विजय दिवस" के रूप में मनाते हैं अपने सैनिकों के अथक प्रयासों और बहादुरी और युद्ध के परिणाम अवश्य ही यह नाम सर्वथा उचित है|
इसके ठीक 41 साल बाद 16 दिसम्बर 2012 को देश की राजधानी में एक ऐसा हादसा हुआ जो नया तो नहीं था परन्तु इसकी गूँज ऐसी थी कि देशभर के लोगों की रूह काँप उठी| शायद ये मानवता की या फिर यूँ कहूँ पुरुषवादी सोच की सबसे वीभत्स ज्ञात घटनाओं में से एक थी| एक तरफ तो एक बेटी जिंदगी और मौत से लड़ रही थी वंही दूसरी और दिल्ली में इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक देश भर से आये युवक और युवतियों ने इस देश के आकाओं से नींद से जागने का आह्वान किया| यह लड़ाई किसी देश के आजाद कराने या विरोध की नहीं थी परन्तु ये थी अपने अधिकारों को सुनिश्चित करने की, कुछ लोगों को अपने कर्तव्य याद दिलाने की और न्याय के लिए गुहार नहीं आदेश सुनाने की| इन युवाओं के संघर्ष ने कानून बनवाकर एक नया इतिहास लिखा परन्तु इस कहानी का दुखद अंत हुआ 41 साल पहले हम जीते थे परन्तु इस बार हम हार गए और ये हार मानवता की हार थी एक तरफ तो उस हम आजादी के 60 सालों में भी ऐसे चिकित्सालय नहीं बना पाए जहाँ हम उस बहादुर लड़की का इलाज करवा पाते वहीँ दूसरी और हमारे नेताओं के एक से एक अजीब बयानों ने पीड़ा को और बढ़ा दिया| किसी ने बोला कुछ लोग फैशन करके इंडिया गेट पर बैठे हैं, कुछ ने छात्रों पर एक पुलिस वाले की मौत का इल्जाम लगाने तक का षड्यंत्र तक रच दिया|
अजीब सी बेचैनी थी कुछ दिनों बाद खबर आई सिंगापूर में उस बहादुर बेटी ने अपने प्राण गँवा दिए हम पराजित हो गए मानवता के मानकों पर ये हमारी सबसे बड़ी पराजय थी| पर क्या हमने उससे कुछ सिखा?, क्या ऐसे मामले कम हुए क्या? लोग सुधरे? ये सवाल हैं और इनके जवाब उस पराजय को रोज जीने का अहसास कराते हैं|
बड़ा असमंजस है इसको विजय दिवस कहूँ या पराजय दिवस

No comments:

Post a Comment