Monday, 23 October 2017

मामा जी अगले दिन साईकिल ले आये थे

मैं दसवीं कक्षा में था, बोर्ड की परीक्षा का साल भारत में सबसे तनाव और उम्मीदों से भरा साल होता है| चार लोगों से इस साल में सबसे ज्यादा परिचय होता है, ठीक से पढ़ ले उसको देख वो कितना पढ़ रहा है अगर ठीक से नंबर नहीं आये तो चार लोग क्या कहेंगे| मैं खुशकिस्मत था मुझे कभी नंबर के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया, माता पिता दोनों अध्यापक हों और पढ़ने के लिए जोर न दिया जाए यह सुख विरले ही किसी को मिलता है|
सर्दियों के दिन थे रोजाना की तरह सुबह साढ़े चार बजे उठा, पांच बजे राजीव भाई जी के यहाँ पढ़ने के लिए जाना होता था| पास वाले गाँव में जाने के लिए रोज सुबह साढ़े चार बजे उठना दिनचर्या का हिस्सा था, सुबह उठकर कभी मम्मी चाय बना देती थी कभी खुद बना लेता था, कभी मन किया तो रात की रखी हुई एक रोटी मक्खन के साथ (शहर जिसको वाइट बटर कहता है) खाकर निकल जाता था| सामने होती थी अपनी हीरो साईकिल मेरी प्यारी साईकिल आजकल उसको स्टैण्डर्ड साईकिल कहने लगे हैं हमारे लिए तो वही थी क्योंकि गाँव में एकाध के पास ही दूसरे प्रकार की साईकिल थी| २२ इंच ऊँची मेरे पसंदीदा हरे रंग में हीरो साईकिल रोज मेरे साथ मिस्सरपुर से पंजनहेड़ी, पंजनहेड़ी से मिस्सरपुर, मिस्सरपुर से कनखल और फिर कनखल से मिस्सरपुर सफ़र किया करती थी या यूं कहूं हम एक दूसरे के साथ सफ़र करते थे, हम एक दूसरे के साथ इतना रम गए थे, कभी वो मेरी पैंट को अपनी चेन में लगे ग्रीस से गन्दा कर देती,कभी मैं उसको कीचड़ में गुजारकर| ये बात अलग थी कि पैंट मम्मी धोती थी और साईकिल को मैं|
राजीव भाई जी के यहाँ हम जाते तो थे गणित पढने पर क्रिकेट के बारे में सबसे गहन चर्चा वहीँ हुआ करती थी, और साथ ही उनका बीच बीच में कोई चुटीली पंक्ति बोल देना पढाई को रोमांचक बनाये रखता|
साईकिल और मेरा रिश्ता ऐसा हो गया था वो खुदबखुद सड़क में हुए गड्ढों से बचाते हुए आसानी से पंहुचा दिया करती थी, कितना कहाँ मुड़ना है अँधेरे में इतना अभ्यास हो गया था कि आँख मूंदकर भी पंहुचा जा सकता था, उस समय सड़क पर अधिकतर कोई वाहन भी नहीं हुआ करता था और ये स्ट्रीट लाइट क्या बला है वो हमने पहली बार शहर में देखी थी तो सड़क पर अँधेरा जबरदस्त रहा करता था|
रात में साईकिल अहाते में या फिर पड़ोस में खाली पड़े खुले हुए बरामदे में खड़ी होती थी, उसके बगल में एक चांदी के रंग की दूसरी साईकिल खड़ी होती थी, वो थोड़ी आधुनिक थी| गाँव में अकसर 7 बजे खाना खाकर बिस्तर में बैठ जाने की आदत है, गाँव में अभी भी कुछेक को छोड़कर लोग जल्दी ही खाना खाकर बिस्तर में बैठ जाते हैं| साढ़े सात बजे साईकिल में ताला लगाकर मैं सोने चला गया|

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