महबूब को छोड़ अब मैंने संदूक पर लिखा है, नहीं नहीं ये वो भैंस पर लिखे मुर्ख छात्र के निबंध जैसा नहीं
संदूक जो हिस्सा है मेरे आपके जीवन के उतार चढ़ाव का
संदूक जिसमे यादें पिछले बरस की, संदूक जिसमे कपडे अगले बरस के
संदूक जिसमे किताबें पिछले बरस की, संदूक जिसमे बर्तन अगले बरस के
संदूक जिसमे रजाई सर्दियों की, संदूक जिसमे खेस गर्मियों का
संदूक भूत है संदूक भविष्य है अरे साहब संदूक ही वर्तमान है
सोचो संदूक न होता तो कहाँ रखते वो पोटलियाँ लिखी हुई खतों की
कहाँ संजोते पुराने फोटो, वो डायरी गुलाब के फूलों की
संदूक ही जिंदगी का मजमून, संदूक बिना सब सून
चलिए शादी में चलते हैं, अरे संदूक से सूंट तो निकाल लाओ
वो दादा जी वाली टाई भी ले आना अच्छी लगती है
मेरे एक दोस्त ने कहा संदूक न हुआ जिमखाना हो गया
अरे आप क्या जाने दीवान में सामान रखके उसके ऊपर सोने वाले
जनाब हम पलंग वाले संदूक में सामान रखा करते थे
हर बरस सर्दियों के आने से पहले और बारिस के जाने के बाद खोला जाता था पूरा संदूक
धुप के हवाले कर दिया जाता था पूरा सामान और बेचारे संदूक को हवा का अहसास तभी होता था
मेरा सच्चा दोस्त था संदूक, उसमे किताबें जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी छिपा दिया करता था
वो भी चुपचाप किसी कोने में ऐसे दबा लेता था जैसे निकलने ही नहीं देगा
संदूक वो कथा है जो पूरी नहीं हो सकती, तो ले लेते हैं संदूक से एक अल्पविराम
संदूक जो हिस्सा है मेरे आपके जीवन के उतार चढ़ाव का
संदूक जिसमे यादें पिछले बरस की, संदूक जिसमे कपडे अगले बरस के
संदूक जिसमे किताबें पिछले बरस की, संदूक जिसमे बर्तन अगले बरस के
संदूक जिसमे रजाई सर्दियों की, संदूक जिसमे खेस गर्मियों का
संदूक भूत है संदूक भविष्य है अरे साहब संदूक ही वर्तमान है
सोचो संदूक न होता तो कहाँ रखते वो पोटलियाँ लिखी हुई खतों की
कहाँ संजोते पुराने फोटो, वो डायरी गुलाब के फूलों की
संदूक ही जिंदगी का मजमून, संदूक बिना सब सून
चलिए शादी में चलते हैं, अरे संदूक से सूंट तो निकाल लाओ
वो दादा जी वाली टाई भी ले आना अच्छी लगती है
मेरे एक दोस्त ने कहा संदूक न हुआ जिमखाना हो गया
अरे आप क्या जाने दीवान में सामान रखके उसके ऊपर सोने वाले
जनाब हम पलंग वाले संदूक में सामान रखा करते थे
हर बरस सर्दियों के आने से पहले और बारिस के जाने के बाद खोला जाता था पूरा संदूक
धुप के हवाले कर दिया जाता था पूरा सामान और बेचारे संदूक को हवा का अहसास तभी होता था
मेरा सच्चा दोस्त था संदूक, उसमे किताबें जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी छिपा दिया करता था
वो भी चुपचाप किसी कोने में ऐसे दबा लेता था जैसे निकलने ही नहीं देगा
संदूक वो कथा है जो पूरी नहीं हो सकती, तो ले लेते हैं संदूक से एक अल्पविराम
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