एक समय था जब परीक्षा के परिणाम से ज्यादा उसके बाद होने वाली छुट्टियों का इंतजार किया करते थे| तक़रीबन हर साल एक यही तो समय होता था जब गर्मियों की छुट्टियां पड़ती थी और मामा के घर 10-15 दिन के लिए जाना होता था| हमारी साल की पिकनिक, भ्रमण वही होता था| मामा का घर मतलब सपनों का आशियाना जहाँ कोई पाबन्दी नहीं खुला आसमान, पेड़, खेत, बाग़ और नहर से निकला हुआ नाला जो हमारा फन पार्क, थीम पार्क, वाटर पार्क और न जाने क्या क्या सब कुछ वही था| गाँव में खेतों के नाम होते हैं, देता वाला खेत, पुलिया वाला खेत, सुबह शुरू होती थी दो रोटी एक गंठा (प्याज) और मेरा सबसे पसंदीदा ननि घी यानि मक्खन (जिसको शहर वाइट बटर कहता है) और मट्ठा यानि छाछ (जिसको शहर आजकल लस्सी भी कहने लगा है) नाश्ता इससे बहतरीन कुछ नहीं| फिर निकल पड़ते नानी, मौसी और मामा के बच्चों के साथ पुलिया वाले खेत में जहाँ उड़द की दाल चुंटी (तोड़ी) जाती, उसको हम बाल्टियों में इकठ्ठा करते, शर्त लगती थी कौन पहले बाल्टी भरेगा| 2-3 घंटे यहाँ बिताने के बाद भैंस, झोटे (भैंसा) और बैलों को लेकर हमारे फन पार्क वाले नाले में जाते थे, जानवरों को नहलाने और मस्ती करने, यमराज की तरह भैंसे की सवारी हम भी करते, नाना को पता होता कि हम भैंसे की सवारी करेंगे तो वो ज्यादातर हमारे आसपास ही रहते, वैसे हमारे घर भी भैंसा और दूसरे जानवर थे पर वहां छूट नहीं होती थी, ऊपर से मम्मी का डर| ये डर दोतरफा था और आज भी है हमें मम्मी की डांट और पिटाई का डर और मम्मी को इनको कुछ हो न जाये वाला डर, ये तो अब शाश्वत है इसका कुछ किया नहीं जा सकता| पर मामा के यहाँ ये बेड़ियाँ और बंदिशें नहीं होती थीं क्योंकि मम्मी को भी तो नाना और नानी का डर होता है अब जो शाश्वत है वो सबके लिए है|
तो हम कहाँ थे हाँ नाले पर, वो नाला इतना गहरा था के हम पैर नीचे रखकर तैरने का नाटक कर सकते थे और तैरना वो आजतक नहीं सिखा उसमे 2 घंटे कभी जानवरों को नहलाते और कभी खुद मस्ती करते, उस समय हमारे लिए सबसे बड़े आश्चर्य की चीज़ हुआ करती थी उसमे बनने वाले भंवर जिसके इर्द गिर्द हमने सैकड़ों कहानिया बुन ली थी कुछ रोचक और कुछ बकवास, सबसे साधारण परन्तु प्रचलित कहानी थी यहाँ भूत है और वो पानी भर के कहीं ले जा रहे हैं, कुछ बड़े होने के बाद पता चला नाले में नीचे से दूसरे छोटे नाले में पानी जाता था इस वजह से भंवर बनते थे|
आगे फिर कभी
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