Monday, 23 October 2017

विमुद्रीकरण-पुनर्मुद्रीकरण-कैशलेस-लेसकैश

प्रधानमंत्री जी की भाषा में विमुद्रीकरण या अरुण जेटली जी भाषा में कहूं तो पुनर्मुद्रीकरण को भारत की जनता ने पास कर दिया है अब ये आने वाला समय बताएगा की पुनर्मुद्रीकरण भारत की जनता को कितना पास करता है| अभी के हिसाब से सरकारी विभाग ये बताने को तैयार नहीं है कि कितना पैसा वापस आया, अपुष्ट ख़बरें ये आ रही है लगभग 97 प्रतिशत पैसा वापस आ चुका है, और अपुष्ट ख़बरें ये भी बता रहीं है कि केन्द्रीय बैंक अभी पुनर्गणना कर रहा है क्योंकि उनको दोहरी गणना का अंदेशा है|
10 दिसंबर को आखिरी बार केन्द्रीय बैंक ने 12.44 करोड़ वापस आने की बात अधिकारिक रूप से कही थी| 8 नवम्बर के प्रधानमंत्री जी के संबोधन के अगले दिन से 2 सप्ताह बाद तक ये चर्चा होती रही और सरकार भी यही कहती रही जो पैसा वापस नहीं आएगा वो इस कदम की सफलता का परिचायक होगा और वो पैसा सरकार लोगों के भले के लिए इस्तेमाल करेगी| दो हफ्ते के बाद दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और अचानक पहले कैशलेस और फिर लेसकैश की तरफ बहस मुड़ने लगी, मुझे भी लगता है कैशलेस या लेसकैश की ओर जाने से कुछ फायदा तो जरुर होगा, परन्तु क्या सिर्फ इसके लिए देश भर को कृत्रिम आपदा के जैसे हालात में झोंक देना सही था| सरकार का लक्ष्य निश्चय ही कुछ ओर रहा होगा जो अभी अज्ञात है और वो अभी बोलना नहीं चाह रहे| कैशलेस का तो कभी भी प्रचार करके, मुद्रा को थोडा रोककर, लोगों में जागरूकता फैलाकर और जैसी अभी स्कीम चलायी गयीं है (जिनको  कुछ लोग सब्सिडी की तरह भीख नहीं मानते [मैं तो सब्सिडी और इनाम दोनों को आवश्यक मानता हूँ]) किया जा सकता था.
जिस दिन विमुद्रीकरण की घोषणा हुई तो मैं और मेरे साथ कईं लोग बिना किसी संशय के ख़ुशी मना रहे थे, मैं प्रधानमन्त्री का आलोचक हूँ पर उसके अपने कारण हैं वो फिर कभी| पर मुझे अच्छा लगा जो चेतावनी प्रधानमंत्री जी ने 30 सितम्बर को ख़त्म होने वाली अघोषित धन से सम्बंधित योजना के लिए दी थी कि यह आखिरी मौका है उसको साकार किया और कहा अब बस जिसके पास है वो कूड़ा हो गया कम से कम कैश वाला तो हो ही गया, जिस राजनितिक दल का मैं समर्थक हूँ वो दो दिन बाद सरकार के फैसले के खिलाफ सड़कों पर था पर मेरा विश्वास नहीं डिगा मुझे लगा कुछ अच्छा होने वाला है और इसमें कुछ तकलीफें होंगी| मेरे दोस्तों ने, गाँव वालों ने अलग से बार बार मुझसे पूछा कि किधर हो, मैंने हर बार यही कहा मैं इस मुद्दे पर केजरीवाल से सहमत नहीं हूँ (वो मुझसे शायद बार बार इसलिए पूछते थे क्योंकि उनको विश्वास नहीं था, पर जो है वो है)| फिर एक दिन अचानक एक खबर आयी कि सरकार कालेधन वालों के लिए  एक और योजना लेकर आ रही है, नाम रखा गया प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (हमारे यहाँ गरीब, देश, सेना कुछ ऐसे शब्द हो गए हैं जिनके बाद सवाल जवाब बंद कर दिए जाते हैं) इस योजना के तहत कालेधन वाले अपनी अघोषित आय दिखाकर सरकार को 50 प्रतिशत देकर 25 प्रतिशत घर ले जा सकते हैं और 25 प्रतिशत 4 साल बाद ले जा सकते हैं, मुझे विश्वास नहीं हुआ सरकार ने कहा था 30 सितम्बर को कि यह आखिरी योजना है अब कार्यवाही होगी, लोग पकडे जायेंगे और सजा होगी, फिर सरकार को ये क्या हो गया था, मेरा विश्वास हिल गया मैंने बहुत बहस की, मुझे बताया गया ऐसा नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो, अगले दिन लोकसभा में बिल आया और लोकसभा में कोई काम हुआ या नहीं हुआ ये बिल पास हो गया सिर्फ एक दिन में एक बिल पास हो गया और वो था इनकम टैक्स अमेंडमेंट जो नयी योजना के लिए लाया गया था उसमे साफ़ साफ़ वोही लिखा था जैसा मैंने ऊपर प्रेषित किया| ये मेरे हिसाब से पहला विश्वासघात था उस जनता के साथ जो देश के लिए लाइन में लगा दी गयी थी, अगर लोगों को डराना इस मुहीम का लक्ष्य था तो 2-4 लोगों पर कार्यवाही करके डराकर तथाकथित गरीब कल्याण योजना लायी जा सकती थी|
दो लक्ष्यों पर हमने बात कर ली एक कैशलेस और दूसरा कालेधन वालों को डराना, इन दोनों के लिए पूरे देश को परेशान करने का कोई औचित्य मेरी समझ से परे है|
फिर एक दिन नया रहस्योद्घाटन किया गया कि राजनितिक दल कितना भी पैसा जमा करा सकते हैं और कोई जांच तक नहीं होगी, कोई आंच नहीं आएगी| प्रधानमंत्री जी ने एक सभा में बोला उनकी सरकार ने पहले से बने नियम में कोई नया बदलाव नहीं किया राजनितिक पार्टियों को पहले से छूट प्राप्त है, मेरा मानना है जब सब नियम रोज रोज बदले जा रहे थे तो क्या यह एक नहीं बदला जा सकता था|
बहुत से लोग बोल रहे हैं कि विमुद्रीकरण या पुनर्मुद्रिकरण के फायदे लम्बे समय में दिखाई देंगे, वो क्या फायदे होंगे या कितने लम्बे समय बाद दिखाई देंगे कोई बताना नहीं चाहता|
ऐसी तैसी डेमोक्रेसी से लिया एक प्रसंग
"पहले : अगर पूरा पैसा वापस नहीं आएगा तो वो जीत होगी
अब : क्योंकि पूरा पैसा वापस आ गया है तो जीत है"
शोले वाला सिक्का

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