यह उस समय की बात है जब मैं गाँव में रहता था ऐसा नहीं है कि अब नहीं रहता क्योंकि दिल से शहर कभी फबा ही नहीं पर अब आता जाता हूँ रह नहीं पाता। जब से पढ़ाई के लिए देहरादून गया तब से घर आना जाना ही होता है क्योंकि उसके बाद से नौकरी एनसीआर में चल रही है। मेरे लिए शहरी बनना बड़ा मुश्किल काम है, वो फिर कभी अभी पढ़िए ट्रांसफार्मर और गाँव की कसमकस!
साल 2004 से पहले की बातें है हमारे गाँव और आसपास के कई गाँव जहाँ जहाँ मैं जानता हूँ ट्रांसफॉर्मर का ख़राब हो जाना एक पूरा कार्यक्रम हुआ करता था।
वैसे मैंने इस कार्यक्रम में सीधे भाग नहीं लिया पर देखा बहुत बार है।
इसके कईं चरण होते थे
- कारण और घर घर चर्चा
- पैसे इकठे करना
- पुराना लेकर नया लाना
- ट्रांसफार्मर को लगाना
- गाँव में रौशनी के साथ हल्ला हो जाना
शुरुआत होती थी कि कैसे ख़राब हुआ आखिर हुआ क्या गाँव में हर घर में मुद्दा होता था आज घास(चारा) कैसे कटेगी, क्योंकि टीवी तो कम ही लोगों के पास होता था होता भी था तो लोग आदि नहीं थे। जब बिजली चली जाती पहले तो यह चर्चा होती कि गयी क्यों, क्योंकि बिजली कईं कारणों से जा सकती थी।
उस ज़माने में ट्रांसफार्मर से बिजली की सप्लाई बंद करने वाली हत्थी (स्विच) पर कोई ताला नहीं लगा होता था। जरुरत पड़ने पर लोग हत्थी से बिजली बंद करके वहां अपना एक आदमी खड़ा कर देते थे जब तक कि घर पर बिजली का फॉल्ट ठीक न हो जाये। कभी-कभी शरारती तत्व भी लोगों को परेशान करने के लिये इस हत्थी को नीचे खींच कर भाग जाते थे।
एक रोज रात को ऐसे ही किसी कारण से बिजली बंद थी। रात का दस बजे का समय रहा होगा। पड़ोस के एक ताऊ जी (गाँव में सब चाचा ताऊ होते हैं अंकल नाम का प्राणी नहीं होता) को लगा कि ट्रांसफार्मर पर देख कर आता हूँ, क्या कारण हैं। अँधेरी रात थी वह ट्रांसफार्मर की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक गोली चली और इसी के साथ दो पुलिस वालों ने उनको चोर समझकर पकड़ लिया। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गए थे। गाँव वालों के बताने पर पुलिस को भी समझ में आ गया था। उस समय अखबार में खबर आयी थी और उसका शीर्षक था…”किस्मत अच्छी थी जो बच गए”
एक रोज रात को ऐसे ही किसी कारण से बिजली बंद थी। रात का दस बजे का समय रहा होगा। पड़ोस के एक ताऊ जी (गाँव में सब चाचा ताऊ होते हैं अंकल नाम का प्राणी नहीं होता) को लगा कि ट्रांसफार्मर पर देख कर आता हूँ, क्या कारण हैं। अँधेरी रात थी वह ट्रांसफार्मर की तरफ बढ़ रहे थे कि अचानक गोली चली और इसी के साथ दो पुलिस वालों ने उनको चोर समझकर पकड़ लिया। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गए थे। गाँव वालों के बताने पर पुलिस को भी समझ में आ गया था। उस समय अखबार में खबर आयी थी और उसका शीर्षक था…”किस्मत अच्छी थी जो बच गए”
अगर ट्रांसफार्मर ख़राब हो जाता तो फिर शुरू होता था पैसे इकठे करने का कार्यक्रम, गाँव के कुछ लोग मिलकर आपस में तय करते थे किससे कितने पैसे लेने हैं और हिसाब लगाया जाता कि किसके यहाँ घास काटने की मशीन चलती है, किसके यहाँ हीटर, कुछ लोग ऐसे होते थे जो कभी पैसे नहीं देते थे तो उनके पास सिर्फ समय ख़राब करने और उनके यहाँ से निकलने के बाद ये बात करने में जाया किया जाता था कि हमें तो पहले ही पता था यहाँ से नहीं मिलने वाले अबकी बार इनके यहाँ सिंगल फेज बिजली देंगे (पर ऐसा कभी होता नहीं था)| पैसे इकठे करने की कुछ वजहें थी, गाँव में लोगों को खुद ही रूड़की तक पुराना ट्रांसफार्मर गाँव से ले जाना और नया गाँव में लाना होता था उसके लिए वाहन तो गाँव के ही किसी व्यक्ति का ले लिया जाता परन्तु आने जाने के तेल, रूड़की में इंजिनियर को रिश्वत देने और जो लोग गए हैं उनके रास्ते में कुछ खाने के प्रबंध के लिए पैसों की आवश्यकता होती थी| इसमें बहुत मेहनत होती फिर भी कुछ लोग नाम रख ही दिया करते थे ये लोग कभी हिसाब नहीं देते सारे पैसे खा पीकर उड़ा देते हैं वगरह वगरह…कोई नहीं यह तो घर घर की कहानी…गाँव गाँव की कहानी है…
अब शुरू होता रोमांचक काम ट्रांसफार्मर को दो खम्बों के बीच बने प्लेटफोर्म से उतारना, मानों पूरा गाँव इकठा हो जाया करता और गांव के ही कुछ लड़के बनाये गए नियत स्थान यानी दो खम्बो के बीच बने प्लेफॉर्म से उतारते थे उस समय भीड़ लगी होती थी हम जैसे बच्चों की और गांव वालों की भी 10 लोग काम कर रहे होते तो 50 उन्हें ऐसा या वैसा करने को चिल्ला चिल्ला कर बोल रहे होते थे। एक यंत्र आया करता है उसको चेनकुप्पी बोला जाता है उसको आप हाथों से चलने वाली क्रेन भी बोल सकते हैं भारी से भारी सामान नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे पंहुचाने में मदद मिलती है।

भौतिकी के सिद्धान्त पर बनी बहुत ही अच्छी हाथों से चलने वाली मशीन है एक आदमी चेन खिंचता रहता है और सामान धीमी धीमी गति से ऊपर या नीचे की और जाता है कुछ कुछ कुँए से पानी खीचने जैसा है पर यह उस समय की और भी आधुनिक मशीन है जिसमे भारी से भारी चीज़ को खीचने में ताकत नहीं लगानी पड़ती मेरे जैसा सामान्य कद काठी का आदमी भी यह काम कर सकता है।
सबसे पहले चेनकुप्पी को ऊपर वाले एंगल में लगाया जाता था फिर चेन के सिरे ट्रांसफॉर्मर में जोड़े जाते थे जिनमें हुक लगे होते, ट्रांसफॉर्मर के निचले हिस्से में रस्सियां बांधकर भीड़ के हवाले कर दी जाती जो ट्रांसफॉर्मर को यथास्थिति में बनाये रखने के लिए होती थी। ये रस्सियां तीन काम करती थीं एक ट्रांसफॉर्मर को खम्बों से टकराने से रोकती, दो उसको पेंडुलम की तरह झूलने से बचाती और तीन सभी दर्शकों के लिए मनोरंजन और चिल्लाने का मौका देती इधर मत करो उधर मत करो (वैसे गाँव की भाषा में इंघे नी ऊँघे नी) फिर 2 आदमी बारी बारी से चेनकुप्पी में चेन खींचते थे, जब एक थक जाता तो दूसरा खींचना शुरू कर देता, कईं बार यही क्रम दोहराए जाने के बाद ट्रांसफार्मर नीचे खड़े वाहन में पंहुचा दिया जाता| इतना होते ही भीड़ छटनी शुरू हो जाती क्योंकि अब नंबर आता था रूड़की जाने का क्योंकि वहां तो सब जा नहीं सकते थे और कुछ तो वाकई में जाना नहीं चाहते थे हम जैसों को जाने नहीं दिया जाता था|
ट्रांसफार्मर लाते हुए भी किस्से हो जाया करते थे, बहुप्रचलित किस्सा है गाँव के भोलेपन और अनजान होने का, उस समय मोबाइल तो था नहीं किसी के पास तो वापस आने की सूचना अकसर रूड़की से नया ट्रांसफार्मर लेकर लौटते हुए रस्ते में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सामने गाँव से लगभग 4 किलोमीटर दूरी पर बिजली घर पर लगे पीएनटी फ़ोन से दी जाती थी, एक बार एक बन्दे ने फ़ोन उठाकर बोला कि हम पंहुचने वाले हैं लाइनमैन को बुला लो, जब वो बाहर आये तो सबने पूछा किसको बोला, किसके नंबर पर मिलाया तो उसने बोला नंबर भी लगाना होता है क्या मैंने तो बस बोल दिया, जिनको मालूम था उन सबने खूब ठहाके लगाये, और मुझे बताया गया कि वो अब भी उस बात को याद करके हँसते पड़ते हैं|
गाँव में बच्चों का नेटवर्क बहुत ही कामयाब होता है जितनी तेजी से बिजली आती जाती थी उसी तेजी से खबर पंहुचने का काम बच्चे किया करते है, जैसे ही ट्रांसफार्मर आता जो भी बच्चा पास में होता उसको गाँव में खबर देने के लिए कहा जाता वो एक मोहल्ले में बोलता फिर वहां से दूसरा बच्चा दूसरे मोहल्ले में और अगला फिर उससे आगे ऐसे करके उस समय के सबसे कारगर नेटवर्क से खबर पूरे गाँव में फ़ैल जाती अब फिर वही मेला लग जाता जो ट्रांसफार्मर के उतरने के समय लगा था|
अब ट्रांसफार्मर को जैसे उतरा गया था उसी चेनकुप्पी के सहारे प्लेटफार्म तक चढ़ाया जाता, फिर से चेनकुप्पी को एंगल में लटकाया जाता और उसमें लगी संकल के सिरे को ट्रांसफार्मर के उपरी हिस्से से बांधकर पहले से विपरीत दिशा की संकल को खींचा जाता और वैसे ही रस्सियों को ट्रांसफार्मर को सुरक्षित रखने के लिए कईं लोग संभाले रखते थे, कभी कभी उस रस्सी को पकड़ने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता तो कईं कईं बार दोस्तों के बीच उसका जिक्र किया करता मैंने आज रस्सी को पकड़ा था या जब उनको मौका मिलता वो भी ऐसा ही करते भले ही हममे से किसी ने जरा भी ताकत न लगाई हो उस रस्सी से बंधे ट्रांसफार्मर को रोकने के लिए और सही में ताकत लगाने लायक स्थिति में हम होते भी नहीं थे| खैर कुछ लोगों की कड़ी मेहनत के बाद ट्रांसफार्मर अपने नियत स्थान पर स्थापित कर दिया जाता|
अब काम शुरू होता था 11000 की लाइन से ट्रांसफार्मर को जोड़ने का जो बेहद ही जोखिम भरा होता था एक तो ऊँचाई पर चढ़कर तारों को जोड़ना और ऊपर से बिजली आ जाने का अंदेशा होना, वैसे तो अधिकतर समय बिजलीघर पर गाँव से कोई गया होता था परन्तु कभी कभी दूसरे गाँव के लोग बिजलीघर में आकर बिजली चालू करने के लिए हंगामा करने लगते थे तो गलती होने की सम्भावना हमेशा बनी रहती थी| फिर भी गाँव के कुछ लोग जो अधिकतर बिजली का काम देखकर सीखे होते थे उनको तकनीकि शब्दावली का भले ही ज्ञान न हो परन्तु बिजली की रग रग से वो वाकिफ़ थे, कौन से तार कहाँ लगने है कैसे अर्थिंग देनी है सब कुछ देख देखकर वो सीख जाते थे और कर भी देते थे|
इस सब मेहनत के बाद बिजलीघर में खड़े आदमी तक सन्देश पंहुचाया जाता कि अब बिजली चालू करवा सकते हो। तब बिजली शुरू की जाती और ट्रांसफार्मर पर लगी हत्थी को ऊपर उठाया जाता, हालांकि अधिकतर बार सबकुछ सही हो जाया करता फिर भी कभी कभी डबल फेज की समस्या आ जाती क्योंकि देखकर सीखना और उसमे कोई एक कमी रह जाना लाजमी है, डबल फेज ऐसी समस्या है जिसमे 100 वाट का बल्ब 200 वाट की चमक तो देता है पर कुछ देर में फट भी जाता है, होता ये था कि जिस मोहल्ले में डबल फेज हो जाता वो चिल्ला रहा होता था बंद कर दो बंद कर दो और उस सूचना को भी बच्चे बखूबी अपने नेटवर्क से ट्रांसफार्मर पर खड़ी भीड़ तक पंहुचा देते|
जैसे ही गाँव में बिजली आती बच्चे पूरे गाँव में शोर मचाते हुए भागते थे उस क्षण का अपना ही आनंद होता था। जैसे ही बिजली आती जिनके यहाँ बिजली से चलने वाली चारा काटने वाली मशीन खच खच करने लगता। एक या दो वीसीआर वाले लोग थे तो उनके यहाँ जमावड़ा लग जाता फिल्म चालू हो जाती। कोई बिजली के माध्यम से जुड़ा था या नहीं फिर भी वो ख़ुशी मना रहा होता और ये उत्सव 3-4 दिन चलता, सब एक दूसरे से बात करते रहते। जिन्होंने काम किया होता वो तारीफ से फूले नहीं समां रहे होते।
ट्रांसफार्मर ही सर्वानंद था उस समय का…भगवान् कसम मजा ही आ जाता था।
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