Monday, 23 October 2017

आरक्षण हमारी बेईमानी का परिचायक है

कुछ दिनों से आरक्षण पर बहस चल पड़ी है वैसे गाहे बगाहे चलती ही रहती है कुछ दोस्तों को लगता है ये व्यवस्था उनके साथ अन्याय है, गुजरात में 1980 के दशक में आरक्षण का विरोध करने वाला पाटीदार समुदाय आज आरक्षण की मांग कर रहा है, तब आरक्षण के बारे में बहुत सारे सवाल जवाबों का सिलसिला चल पड़ा है| फिर उसमे संघ प्रमुख का कूद जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है उनका कहना है कि आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए| मेरी समझ में वो अपने उन समर्थकों को खुश करना चाहते हैं जो आरक्षण विरोधी हैं उससे अधिक कुछ भी नहीं वर्ना अगले ही दिन वो अपना पक्ष एकदम उलट नहीं देते|
मुझे याद है लोकसभा में भाषण में कांग्रेस को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि "आप मेरी राजनितिक बुद्धि पर तो शक नहीं कर सकते हैं मैं कभी मनरेगा (रोजगार गारंटी योजना) को बंद नहीं करूँगा क्यूंकि ये आपके के फेल होने का परिचायक है,आपने इतने साल शासन में रहने के बाद गरीब को कुछ दिन गड्ढे खोदने का काम दिया"
बिलकुल इसी तर्ज पर मैं कह सकता हूँ आरक्षण हमारे इंसानियत के तौर पर फेल होने का परिचायक है हम लोग इस कदर बेईमान हैं कि जिसको हमारे पूर्वजों और हमने उठने का मौका देने की बात तो छोडिये, उनके कुछ कामों को करने तक पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, उनको दी गयी सुविधा को बंद करने की मांग करते हैं|
कुछ लोग कहते हैं आरक्षण पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए और कुछ कहते हैं कि आरक्षण का आधार गरीबी को कर देना चाहिए| हम लोगों को समझना चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है|
हम लोगों की बेईमानी को देखते हुए इसका क्या भरोसा कि आरक्षण को गरीबी आधारित करने के बाद गरीबों को ही उसका फायदा मिलेगा, पैसे देकर गरीबी के सर्टिफिकेट बनवाने वाले अमीरों को भी तो जानते हैं हम| इसी साल पता चला दिल्ली में EWS यानी स्कूल में गरीबों के लिए आरक्षित स्थानों पर कई अमीरों ने गरीबी के सर्टिफिकेट बनवाकर अपने बच्चों को दाखिला दिलवा रखा है, पता नहीं कितने सालों से ये खेल चल रहा होगा|
एक आरक्षण और है, "जो मध्यम वर्ग या उससे उपरी तबके वाले दोस्त जिनमे मैं भी शामिल हूँ" के काम आता है उसको बोलते हैं सिफारसी आरक्षण, हम लोग सिफारिस के फायदे उठाकर नौकरी या कोई काम पाते हैं और पीछे से बोलते हैं आरक्षण ख़त्म कर देना चाहिए| क्या हम पिछड़ी जाति के किसी व्यक्ति को सिफारिस लगाकर नौकरी देते हैं कुछ अपवाद को अगर छोड़ दें तो सिफारसी आरक्षण का लाभ सिर्फ उपरी तबका ही उठाता है| क्या आप और हम ये शपथ पत्र देने को तैयार हैं कि सिफारसी आरक्षण का लाभ नहीं उठाएंगे|
आपको आरक्षण को ख़त्म करने के बारे में अगर सोचना भी है तो ईमानदारी से सोचना होगा और अपने कर्तव्य निर्धारित करने होंगे|

एक तर्क है कि आरक्षण के कारण कम प्रतिभा के छात्रों को जगह मिल जाती है,वो डॉक्टर बन जाते हैं जज बन जाते हैं सरकारी नौकरी मिल जाती है बड़े अधिकारी बन जाते हैं, चलिए इसका जवाब तलाशते हैं इसमें कितनी सच्चाई है, पहली बात जन्म से हम उन लोगों को इतना प्रताड़ित करते हैं उनकी जाति को लेकर उनके रहन सहन को लेकर, उनके खान पान को लेकर, उनको पढने तक का मौका देने से कतराते हैं मैंने कईं ऐसे अध्यापकों को देखा है जो जाति के आधार पर नंबर देते हैं आप कहेंगे बड़ी परीक्षा में किसी का नाम नहीं जाता, सही है पर हमने जिसे बचपन से सिखाया है कि तू अच्छा आदमी नहीं बन सकता जो तेरे माता पिता करते हैं वोही तेरा काम है वो उन सब विचारों से लड़ता हुआ अगर बड़ी परीक्षा दे भी रहा है वो तो वैसे ही जीत चुका है हमारी परीक्षा उसे क्या फेल करेगी| पर वो जद्दोजहत करता हुआ किसी उपरी तबके के छात्रों जो किसी भी परीक्षा की तैयारी में लाखों रूपये फूंक देते हैं उनसे उसके 10-20 नंबर कम आने पर हम प्रतिभा कम होने का रोना रोते हैं|
मैंने पहले भी एक सच्ची कहानी आप लोगों से साझा की है, मेरे दो दोस्त(उनके नाम इसलिए नहीं लिखता हूँ कहीं उनकी खुद्दारी को ठेस न पंहुचे क्यूंकि वो हमेशा कक्षा में प्रथम आते थे बिना किसी सुविधा के) आज मेरा उनसे संपर्क नहीं है पर वो दोनों भारत की एक प्रतिष्ठित कम्पनी में काम करते हैं और आरक्षण के कारण वो उस कम्पनी में पंहुच पाए है| उनके शुरूआती जीवन के बारे में हम और आप सोच नही सकते गर्मियों की छुट्टियों में जब हम लोग ननिहाल जाया करते थे तब वो एक शराब की फैक्ट्री में बोतलों पर ढक्कन लगाते थे| हमें जब सुबह स्कूल जाने के लिए उठाया जाता था तब वो किसी ट्रक में रेत भर रहे होते थे| उनकी प्रतिभा हम सबसे कहीं ऊपर है जो किसी परीक्षा तक पंहुच भी जाते हैं मुझे याद है जब हम पांचवी कक्षा में थे तब जिलास्तर पर वजीफे के लिए एक प्रतियोगिता होती थी उसमे हम तीन दो वो मेरे दोस्त और एक मैंने अगले तीन साल के लिए वजीफा प्राप्त किया था उनको थोडा अधिक मिलता था मुझे थोडा कम, मेरे भी दिमाग में यही आता था ऐसा क्यूँ जब हम तीनों ने एक ही परीक्षा दी है तब ये भेदभाव क्यों, पर आज मुझे उसके सारे मायने पता हैं वो लोग सुबह उठकर काम करके दिहाड़ी मजदूरी करके भी उस प्रतियोगिता में हमारे जैसे कईं सुविधाओं से लैस या कम से कम कोई काम तो नहीं करते थे उन सबमें वो जीते, वो तो हर उस वजीफे के हक़दार हैं जो मिल सकता हो, आरक्षण मेरे लिए वोही वजीफा है|

एक और तर्क है हमारे पूर्वजों के द्वारा किये गए गलत कामों की सजा हमें क्यों, इसका कुतर्की जवाब है मेरे पास मुझे मालूम है ये ठीक जवाब नहीं है फिर भी लिख देता हूँ क्योंकि बहुत सारे कुतर्क पढने के बाद एक आध तो हम भी दे सकते हैं "जब हम अपने पूर्वजों के शौर्य और अभिमान को साथ लेकर चलते हैं तो उनके कुछ गलत कामो को भी ढोना पड़ेगा"
चलताऊ जवाब है पर सच है हम रोज रोज बोलते हैं हमारे पूर्वज ऐसे थे वैसे थे उन्होंने ये जीता वो जीता तो हमें ये भी मानना पड़ेगा उन्होंने एक बेहद ही शर्मनाक परंपरा को भी आगे बढाया, अगर हम भी बढ़ाएंगे तो हमारे आने वाली पीढ़ी को भी झेलना पड़ सकता है|
आरक्षण व्यवस्था से आपको लग सकता है किसी के साथ ज्यादती हो रही है पर ये उन सब ज्यादतियों से कम है जो वो बचपन से झेल रहे होते हैं, उनके पुरखों ने झेली है और दिमाग में डाल दिया गया कि ये काम आपके हैं और ये नहीं|

No comments:

Post a Comment