Monday, 23 October 2017

भीमराव आंबेडकर एक विरोधी व्यक्तित्व

पिछले कुछ दिनों से आंबेडकर को पढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ
 
Annihilation of caste (हिंदी में "जाति के विनाश") लेख बहुत क्रन्तिकारी और हिन्दू धर्म की बहुत सारी कुरीतियों पर चोट करने वाला है इतना कि अगर आज के परिपेक्ष्य में देखूं तो उनको रोज देशद्रोही करार दिया जा सकता था, उस समय भी दिया गया था|
इस लेख के बारे में एक रोचक बात भी है ये लेख वास्तव में लाहौर में होने वाले जात-पात तोड़क मंडल के सम्मलेन के लिया लिखा गया भाषण था, जिसमे आंबेडकर को अध्यक्ष के तौर पर बोलना था, परन्तु जब भाषण कार्यक्रम आयोजित करने वाली समिति ने पढ़ा तो इसके अति हिन्दू विरोधी होने के कारण उस सम्मलेन को ही स्थगित कर दिया गया| उसके बाद आंबेडकर ने अपने पैसे से इस लेख की 1500 प्रतियाँ छपवाकर बंटवाई, जिसका पहला संस्करण अंग्रेजी  में था और फिर इस लेख के और भाषाओँ जैसे हिंदी, मराठी में अनुवाद भी छपे| उसके कुछ समय बाद आंबेडकर ने लगभग एक श्रृंखला इस प्रकार के लेखों की प्रकाशित करायी|
 
इस लेख में पहले आंबेडकर ने कुछ साल पहले होने वाले राजनितिक और सामाजिक सुधार सम्मेलनों का जिक्र किया और बताया की दोनों सम्मलेन पहले एक साथ शुरू हुए और उसके बाद अलग अलग पंडालों में लगने लगे, राजनितिक धड़ा उस समय की भारतीय कांग्रेस के समर्थन में आ गया और सामाजिक धड़ा सामाजिक सुधार के पक्ष में, परन्तु धीरे धीरे सामाजिक पक्ष कमजोर होता चला गया, कटुता इतनी बढ़ गयी थी कि जब सामाजिक सम्मलेन के लिए अलग से पंडाल बनाया जा रहा था तो विरोधी पक्ष ने पंडाल जला देने की धमकी तक दे डाली|
आंबेडकर के शब्दों में विरोध बढ़ता जा रहा था एक तरफ तो उन्होंने उस कालखंड के आसपास हुई दलित विरोधी घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया वहीँ राजनितिक पक्ष और कांग्रेस के कुछ नेताओं को आड़े हाथो लिया, कांग्रेस के 1892 के इलाहाबाद अधिवेशन में कांग्रेस के श्री डब्लू सी बोनेर्जी के वाक्यों को सामाजिक आन्दोलन के अंतिम संस्कार का भाषण करार दिया जिसमे उन्होंने कहा था
"मेरे अन्दर उनके लिए कोई धैर्य नहीं है जो कहते हैं बिना सामाजिक सुधार के हम राजनितिक सुधार योग्य नहीं बन पाएंगे| मैं इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं देख पा रहा हूँ| क्या हम राजनितिक सुधार के योग्य इसलिए नहीं हैं कि हमारे यहाँ विधवा विवाह नहीं होता या हमारी लड़कियों की शादी समय से पहले कर दी जाती है, जब हम अपने दोस्तों के यहाँ जाते हैं तो हमारी पत्नी और बेटियां साथ में नहीं जाया करती, और क्या हम राजनितिक सुधार के लिए योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि हमारी बेटियां ऑक्सफ़ोर्ड या कैंब्रिज पढने नहीं जाती"
ये सामाजिक सुधार पक्ष के लिए कटाक्ष सरीखा था और उनकी हार को घोषित किया जा चुका था|
 
Annihilation of caste के बहुत सारे हिस्से हैं जो आपको पढने चाहिए, हाँ आपको आगाह कर देना चाहता हूँ अगर आप हिन्दू धर्म की आलोचना पढना या सुनना नहीं चाहते तो कृपया न पढ़ें या कम से कम मुझे न बोलें|
 
मैं उस पक्ष को अभी इसलिए प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ एक तो मैंने ठीक से अभी पढ़ा नहीं है और दूसरा मैं अभी कड़वी बातें किसी से नहीं सुनना चाहता जो उस लेख के बाद आंबेडकर को सुनाई गयी थीं
 
विस्तार से पढने के लिए http://www.ambedkar.org/ambcd/02.Annihilation%20of%20Caste.htm यहाँ जाएँ
 
आंबेडकर का बीबीसी के साथ इंटरव्यू सुना जिसमे वो गाँधी की आलोचना करते हैं और कहते हैं की गाँधी तीन अखबार निकालते हैं "हरिजन", "यंग इंडिया" और एक गुजराती भाषा में, आंबेडकर यहाँ कहते हैं गाँधी दो तरह की बात करते हैं एक तरफ वो "हरिजन" और "यंग इंडिया" में कहते हैं समानता आवश्यक है और दलितों को उनके अधिकार मिलने चाहिए और दूसरी ओर गुजराती अखबार में सनातन धर्म और जाति व्यवस्था को उचित बताते हैं और जब मैं जाति प्रथा को जड़ से मिटाने की बात करता हूँ तो वो मेरा विरोध भी करते हैं| उनके बारे में जो लिखा पढ़ा जाता है वो सिर्फ उनके दिल्ली से निकलने वाले लेखों से एक धारणा बनाने के लिए किया जाता है ये आंबेडकर कह रहे हैं| फिर आंबेडकर कहते हैं गाँधी को उनके अनुयायियों से ज्यादा मैं जानता हूँ क्यूंकि मैं जब उनके सामने बैठता हूँ तो मैं उनको महात्मा या भगवान् के रूप में नहीं देखता बल्कि एक दो तरह की बाते करने वाले व्यक्ति के तौर पर देखता हूँ|
 
अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने कहा मैं अपना हिन्दू धर्म में पैदा होना नहीं बदल सकता परन्तु मैं एक हिन्दू रहते हुए नहीं मरूँगा और बम्बई में हुए एक समारोह में अपने पांच लाख समर्थकों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया (संख्या की प्रमाणिकता का कोई साक्ष्य मेरे पास नहीं है)|
 
14 अप्रैल को बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्मदिन है सभी कमर कस लें सभी राजनितिक दल आंबेडकर को भुनाने में लगने वाले हैं
हर दल के नेता चाहे वो आंबेडकर के दिखाए गए रास्ते के धुर विरोधी हों ऐसा प्रवचन देंगे जैसे यही आंबेडकर के सच्चे अनुयायी है, अनुयायी से मेरा मतलब आंबेडकर को भगवान् मानकर उनके भजन यापन में लगने से कतई नहीं है क्योंकि आंबेडकर स्वयं व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे|
आरक्षण के बारे में अपने समाज हाँ अपने समाज की मीटिंग में कड़वी से कड़वी बातें करने वाले लोग कल आंबेडकर की वो किताब ली हुई मूर्ति पर माल्यार्पण करते हुए दिख जायेंगे, इन लोगों को देखकर मुझे अपने वो सहपाठी याद आ जाते हैं जो 10वीं कक्षा में गुरूजी के पैर छूते हुए उन्हें गाली दे रहे होते थे|
 
आंबेडकर जो व्यक्ति पूजा के घोर विरोधी थे आज उनको वहीँ रख दिया गया है कुछ ने तो आंबेडकर के चक्कर में अपनी भी बनवा डाली, तो अपनी अपनी मूर्ति चुनों और माला लेकर लग जाओ काम पर नमस्कार

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