Monday, 23 October 2017

FDI मेरी सोच

मुझे बताया और समझाया जा रहा है के FDI आने से मेरी ज़िन्दगी बदल जाएगी
सामान सस्ता मिलने लगेगा किसान को ज्यादा पैसा मिलने लगेगा
मुझे याद है कुछ साल पहले मुझे ये भी समझाया गया था के संग आने से आपका किराया कम हो जायेगा,उसका क्या हुआ हमने देख लिया
अभी मेरे एक दोस्त ने सत्यमेव जयते देखते हुए मुझे कुछ याद दिलाया
“के एक शहर है जो बिलकुल साफ़ रहता है
पर वहां के लोग ये नहीं सोचते के जो हमारे यहाँ सफाई हुई है वो कूड़ा कहाँ गया
वो भी तो कहीं न कहीं गन्दगी फैला रहा होगा”
FDI मेरे लिए बिलकुल वैसा ही है शायद कुछ समय के लिए मुझे
सामान थोडा सस्ता भी मिल जाये और कुछ लोगों को फायदा भी हो जाये
पर उनका क्या जिनकी रोजी रोटी छीन जाएगी या फिर उनको अपने जीवन की फिर से
शुरुआत करनी पड़ेगी या शायद ख़तम भी करनी पड़ जाएगी जिनको आज हम बिचोलिये
बोलते हैं और कुछ छोटे दुकानदार उनका क्या , आज हम FDI का समर्थन या विरोध कर सकते हैं
पर जब कोई FDI के चक्कर में ख़ुदकुशी करेगा तो हमें India Gate पर मोमबत्ती जलाने का अधिकार कतई नहीं होगा
मै ये कतई नहीं बोल रहा हूँ के हम अपने बारे में न सोचें अपना फायदा या मुनाफा न देखें
देखें खूब देखें पर फिर किसी और से आपको फायदा पँहुचाने के बारे में थोडा सोच लें
और क्या हम सिर्फ Executives के बारे में सोचने लगते हैं हमारी सोच इतनी संकुचित हो जाती है
जैसे इधर उधर का न दिखे उसके लिए घोड़े के आँखों पे एक अँखौड़ा (blinder) लगाया जाता है
हमने बिना अँखौड़ा के ही इधर उधर देखना बंद कर दिया है
क्या FDI का विकल्प नहीं है है बिलकुल है बहुत समय से हम अपने देश में सुनते आ रहे हैं
मझोले यानि छोटे उद्योग जो हमारे लिए हमारे द्वारा बनाये गए उपकरण, सामान , दवाइयां
और वो सब चीजें जो हम आयात करते हैं लेकिन उनको हम आसानी से अपने यहाँ बना, उगा सकते हैं
कुछ समय पहले आपने सुना होगा हमने गेहूं तक आयात किया था जबकि हमारा गेहूं हमारे अपने गोदामों
में सड़ रहा है, तो क्या पता कल हम सब्जियां भी मँगाने लगें जो हम आसानी से उगा रहे हैं|
 
लोग बोल रहें हैं FDI से उपभोक्ता को फायदा होने वाला है मैं कैसे विश्वास कर लूं पिछले 13 साल से महारास्ट्र सत्तर हज़ार करोड़ रूपये सिर्फ DAM बनाये गए हैं और उन DAM से १% भी सिंचाई की ज़मीन में इजाफा नहीं हुआ तो मैं कैसे मान लूं के विदेशी निवेश आएगा और उसको किसानो की ज़मीन में लगाया जायेगा जो पैसा हमारे पास है उसको तो हम लूटा रहें हैं और विदेशी पैसे की और देख रहे हैं कैसे ये हो सकता है विदेशी कम्पनियाँ आएँगी हमारे किसानों को खेती के लिए पानी देंगी नहरें बनायेंगी और अगर ये बोला जाये की वो पैसा देंगी और सरकारें पानी देंगी इन सरकारों पर कैसे भरोसा किया जाये जो सत्तर हज़ार करोड़ लूटा कर भी एक प्रतिशत सिंचित ज़मीन न बढ़ा पायें वो हमारे किसानो को मदद कैसे करेंगे|
मान लेता हूँ सब अच्छा अच्छा होने जा रहा है उपभोक्ता को बहुत फायदा होने वाला हैं किसान को बहुत फायदा होने वाला है पर उस मुर्गी (ज़मीन) का क्या सोने के अंडे देती है और जिसको हम थोड़े से स्वार्थ के लिए काट रहे हैं और इन कंपनियों के लिए इसको और तेज़ी से काटने वाले हैं मुझे पता है बहुत से लोग मेरी बात को नहीं मानेंगे पर मैं अपना ही उदहारण रखता हूँ हमारी ज़मीन में दस साल पहले तक आठ क्विंटल प्रति बीघा गेहूं हुआ करता था आज यूरिया और रासायनिक दवाईयों के छिडकाव ने ये उपज घटा कर ढाई क्विंटल प्रति बीघा कर दी है जबकि हम बीच बीच में जैविक खाद का भी उपयोग करते हैं|
बहुत अच्छे अच्छे सपने दिखाएँ जा रहें हैं मैं कामना करता हूँ सपने सच हों! पर विश्वास तो कतई नहीं है|
एक तर्क दिया जा रहा है कुछ ही शहरों में तो ये लागू होने जा रहा है और एक बार तजुर्बा करके देख लेते हैं अगर नुकशान भी हुआ तो थोडा होगा! मैं इस तर्क के सख्त खिलाफ हूँ और हमेशा इस तर्क के खिलाफ रहूँगा! हाँ एक बात और कही जा रही है के हम खेती और खुदरा व्यापार को संगठित करना चाहते हैं अच्छी बात है शायद कुछ अच्छा हो इससे पर क्या इसके लिए हमें बाहरी किसी कंपनी के निवेश की जरुरत है!

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